घुमक्कड भूत: kamal kumar singh
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Friday, June 13, 2014

लेह - लद्दाख . 27 July से 02 August 2013

छत तो मैंने बहुत देखे,  अमीर का छत, गरीब का छत, जानवर का छत, इंसान का छत, लेकिन एक चाह थी की जितने छत इस धरती पर बने है कम से कम उस धरती का छत भी देखू. मौका आया.

१० जुलाई के आस पास कम्पनी ने हमारा नाम फैम के लिए घोषित किया, कि २० जुलाई से २७ तक लेह जाना है, जाईये घूमिये  फिरिए खाइए, वापिस आईये फिर जुट जाईये हल में, इसमें कोई बुराई भी नहीं.

तैयारियां की गयी, सामान जुटाए गए (समझ जाईये), सीना चौड़ा कर कई लोगो को बताया भी, १९ जुलाई  की रात अपने एक सहकर्मी के डेरा जमाया जिसका घर एयरपोर्ट के पास था.  रातभर  कोई सोया नहीं, सारे खी खी खु खु करते रहे, इस खि खी -खु खु में काफी कुछ  महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जिसका हम दिल से धन्यवाद देते है.  सुबह के ५ बजे फ्लाईट थी और हम १२  बजे निकल लिए, बाकी साथी भी आ चुके थे, सुबह ४.३० पर हम इन हुए, फ्लाईट उडी, धक्का लगा, लेकिन मजा आया.

मै अधखुली आँखों से सपना देख रहा था, की पहुच के क्या क्या करना है ? कैसे घूमना है, कहा जाना है (हालाकि सब कुछ आफिस की तरफ से तय था) एक घंटे बाद  जब हम लेह के ऊपर भूखे  चिल्ह  की तरह मडराने लगे तो कलेजा ख़ुशी  के मारे मुह को आ गया. उफ्फ्फ, क्या दृश्य है ये. बिलकुल सुबह सुबह सफ़ेद बर्फ पर सूरज की पहली किरण इसी पवर्त माला को सलामी देते हुए ख़ुशी से लाल हो रही थी,  लेह के पवर्त अपने सफेदी का घमंड छोड़ अरुणोदय के साथ ख़ुशी में लाल हुए पड़े थे. खिड़की के लिए पीछे वाला परिवार कांव कांव भी करने लगा, जिसकी तरफ बिना ध्यान दिए हुए हम बस नीचे देखे जा रहे थे. वाह ..

तभी पालयट की आवाज गूंजी, मौसम ख़राब होने की वजह फ्लाईट लैंड नहीं होगी. इसे हम अपनी  भाषा  में  "के एल पि डी"  कहते है (Kya Laut aye Purane Din).  खैर ये तो हो चूका था, वापिस होते समय एसा लग रहा था जैसे इज्जत लुटा के आये हो.  खैर ये समस्या आम है इस रूट पे, १०० में से ५ फ्लाईट के साथ यही  होता है मौसम की वजह से, और ये भी कहा जाता है की इस एअरपोर्ट पे फ्लाईट लैंड करना अपने आप में एक चुनौती है,  रन वे काफी छोटा है, एयर फ़ोर्स का है.

फिर हमारा डेट  रीशेडूल हुआ २७ जुलाई को. अबकी बार विश्वाश था, किस्मत इतनी भी ख़राब नहीं, ख़ुशी भी थी एक बार की रेकी यु ही हो गयी थी.

एअरपोर्ट पे उतरते ही लम्बी सांस ली, वो इसलिए की बाहर निकलते आक्सीजन की कमी होनी है, और दूसरा इसलिए की अभी मुह काला करा के वापिस नहीं लौटना पड़ा. उतरते ही फोटो शूट हुआ. हमारी गाडिया लगी थी, हम होटल की और चले.

ली - चेन होटल एक साफ़ सुथरा ३ स्टार होटल है, इसका लोकेशन भी खूबसूरत है , बाजार भी पास और शांति स्तूप भी.

चेक इन  करते ही सब प्लान बनाने लगे, की पहले पिया जाय या घुमा जाय, तो तय हुआ की घुमा जाय. पहले की दिन लेह की साईट सीन हुयी, हालाकि यह मना होता है, पहले दिन यहाँ एक्लेमाईटेजेशन के लिए सजेस्टेड है "आम यात्री- पर्यटक के लिए " के लिए.

लेह यु तो लामावो और बुधिष्टो का जगह माना जाता है, लेकिन यहाँ की खूबसूरती एक बार जब आपके रंग पे चढ़ेगी तो आप बाकी भूल जायेंगे. खूब सूरत सुखी पहाड़िया,  सर्द हवाएं .. आधी बर्फ से ढकी पहाड़ियां ...उफ़. 

 यहाँ के बाजार बहुत खुबसूरत है और रेस्टोरेंट भी, यहाँ आपको कई ऐसे रेस्टोरेंट मिल जायेंगे जो थीमेटिकल है, और बेहद खुबसूरत बिना ताम झाम के,  आप यहाँ छोटी सी ड्रिंक ले सकते है. इसके बाद यदि आपने स्ट्रीट फ़ूड न उड़ाया तो क्या किया ? नॉन वेज के शौक़ीन के लिए यहाँ काफी ऑप्शन है. बिलकुल देशी स्टाईल में बना नॉन वेज.  यहाँ बाईक भी आसानी से मिल जाती है किराए पे जिसका किराया आम तौर पर ३०० से ४०० तक प्रतिदिन होता है, पेट्रोल आप खुद भरवा ले फिर आप बंजारा से ले के फक्कड़ सब अपने आप बनते जाते है.

पहले दिन हेमिस मोनेस्ट्री देखा  जो बेहद ही खुबसूरत था और बाजार में ही तफरी रही जो की उपर बताया जा चूका है. 

दिन ख़त्म हुआ, शाम तक सब बुरी तरह थक गए लेकिन  सब खुश लग रहे थे, और न थके होने का नाटक कर रहे थे, "फटे तो फटे पोजीशन न घटे". शामे महफ़िल जमी और कुछ देर में ही कोई गायक बन गया, कोई कवि, कोई संत, कोई राजिनितिग्य, कोई दार्शनिक, कोई लुढक गया, और कोई उल्टी किया. 

                                                एयर पोर्ट पे




                                                                                 
                                                   सबकी  अंतरात्मा जागने को तैयार. 
Day  2: लेह   :

सूरज निकलने के साथ साथ ही रात का कवी, नेता, दर्शन सब गायब था, अभी सभी आदमी थे.सभी तैयार हुए. आज पूरा लेह घूमना था. सबसे पहले हम गए संगम, जी हाँ यहाँ भी संगम है, इंडस और सिन्धु नदी का, बेहद खुबसूरत, यहाँ की हर चीज शायद इसलिए भी  खुबसूरत लगाती है क्योकि लादधाख खुद खूब सूरत है. उसके बाद बारी थी गुप्त काल के  थीक्से मोनेस्ट्री की जहाँ से पूरा शहर देखा जा सकता है.  

मुझे सच में विश्वाश नहीं था की कोई ऐसी जगह हो सकती है जो गाड़ी को अपने चुम्बकीय प्रभाव से खींचे. कार का इंजन बंद था. ढलान पहाड़ी के विपरीत था, फिर भी गाढ़ी धीरे धीरे पहाड़ी की और चली जा रहा ही थी. ये एक बड़ा अद्भुद और गजब का आश्चर्य था हमारे लिए, पता नहीं क्यों ये दुनिया के आश्चर्यों में शामिल नहीं. सरकार को तेल खोजने की जगह कुछ ऐसी पहाड़ी हर दिशा में  उगाना चाहिए. 

शाम हो चुकी थी, सब कवि,  दार्शनिक, नेता, गायक बनने के मूड में आ चुके थे. 



                                            लेह पैलेस

                                            मैग्नेटिक हिल
                                                         संगम 

Day 3 : लेह - नुब्रा : १६० किलोमीटर

यु तो ये बस कहने के लिए है की १६० किलोमीटर और ४ घंटे, लेकिन आप मजे कर के चले तो पुरे दिन का रास्ता है. 
तीसरे दिन का सफ़र रोमांचक रहा, सड़क जय था और साथ चलने वाली नदी वीरू, दोनों के साथ साथ हम लोग, सोचिये जरा जब आपके पास करने को कुछ न हो, न कम्पूटर, न मोबाईल, न फोन, और सामने बॉस या उनका चेहरा या उनका ख्याल न हो, हो तो बस एक लम्बा सुन्दर रास्ता और साथ साथ बहने वाली नदी, सोचिये कितना अदभुद आनंद आता है, ये उस दिन पता चला,  यात्री दूल्हा हो और सड़क बीवी तो साथ चलने वाली  नदी बिलकुल साली सा एहसास कराती है ( शादी शुदा लोगो को समझने में आसानी होगी).

रस्ते में पड़ती है मैत्रेयेयी  बुध्धा की ३५ मीटर ऊँची बेहद खुबसूरत मूर्ति, आपके मुह से "वाह" बरबस  निकलवा लेती है,  और दीक्षित मोनेस्ट्री अपने आप में बेजोड़ है.  

रास्ते में पड़ने वाली खार्दुन्गला पास जो की विश्व की सबसे जादा ऊँची मोटरेबल सड़क पे है, आपके सहनशक्ति को एक बार जरुर हिला देगी.  लेह में पहली बार मै यहाँ थोडा कमजोरी महसूस कर रहा था, सांस लेने में भी तकलीफ हुयी. लेकिन मै daymox की गोलिया साथ लाया था, यहाँ काम आई. 

अब आप नुब्रा वैली में आ चुके है, रास्ते में पढता है कैमल सफारी का स्थान, जो  न करना एक बेहद रोमांचक एहसास को छोड़ देना जैसा होगा. ३०० से ४०० तक में आधे घंटे का बर्फीली रेगिस्तान में इस एहसास को छोड़ना सच में बेहद नाफ़रमानी वाली बात है. 

 कोई ४ बजे तक हम अपने कैम्प पहुचे- तीरथ कैम्प. आडू, और सेब के पेड़ो से घिरा तीरथ कैम्प कोई ४ एकड़ में फैला हुआ बेहद खुबसूरती के साथ कोई ३० टेंट समाये हुए है. जहाँ आप जी भर के सेब खा सकते है और जेब भी भर सकते है, कोई रोकने वाला नहीं देश खाने वाले नेतावो के लिए मुफीद जगह है. पहुचते ही सबने हनुमान बन पेड़ो पे आक्रमण कर  जी भर उड़ाया, फिर शुरू हुआ चाय पकौड़ो का दौर. शाम हो चली  थी, सबका कवी, नेता और दार्शनिक जागने को हो रहा था, लेकिन उत्प्रेरक स्थान आस पास न होने की वजह से ड्राईवर को याद किया गया, सच में देवदूत था वो हम सभी के लिए कम से उस समय. बचा हुआ "प्रसनाल्टी मेकर" उसके हवाले किया गया तो वो खुश हो गया, फिर हजार  रूपये दे के  सबने अपने हिसाब का "मेकर" मंगवाया. 

शाम को कैम्प फायर हुआ, जबरजस्त, सबका कलाकार बाहर आ चूका था, यहाँ सिर्फ हम ही नहीं नहीं बल्कि देश भर के राजनीतिग्य, कवी, नॉनवेज सुनाने वाले अपने फार्म में आ चुके थे, जो की  रात के कोई २ बजे थके तो याद आया की उन्हें सोना भी है. 





Day 4 : नुब्रा - लेह. 
भारी मन से तीर्थ कैम्प को बिदाई दी, और पेनोंग के सपने देखने लगे. रास्ते में जम के फोटोग्राफी. 

Day : 5 लेह - पेनोंग: 

क्रमश: .... 




Tuesday, March 12, 2013

2-IATO -डाईरेक्टर/ सीनियर मैनेजमेंट लेवल फैम ट्रिप टू सिक्किम.-2

पहली कड़ी पढने के लिएय यहाँ क्लिक करे 
तीसरा दिन  गैन्गटोक  : सुबह ही उठते उगते सूरज का नजारा करना था, लेकिन अफ़सोस सूरज भी दिल की तरह निकले, धोखा दे गए . फिर शुरू हुआ छंगु लेक की यात्रा, यह लेक भारत के सबसे खुबसूरत झीलों में से एक है. जहाँ मईअस टेम्परिचार पर भी यहाँ का पानी नहीं जमता और यही इसकी खास बात है, जबकि बाकी जगह पानी जम  के फ्लोर हो जाता है.  जहाँ  जहाँ भी हमारी इन्नोवा रुकती , फटाफट नज़ारे कैद हो जाते . 


बर्फ है  या कपास 





यहाँ फिर हम पैदल बढे 

 हमारे गाडी लगभग  १० किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से चल रही थी, हलकी बारिश हो राखी थी, टायर हर मिनट फिसलते थे. वैसे भी रास्ता काफी सकरा है यहाँ का. कुछ किलोमीटर चलने के बाद आगे गाडी जाने की स्थिति में नहीं थी,  क्योकि  भारी बर्फ बारी हो रखी थी, लेकिन हम लोगो ने ठाना की हम पैदल ही जायेंगे , जबकि बाकी के टूरिस्ट वही से वापस हो रघे थे. यहाँ पर मिस्टर प्रसाद रुक गए, क्योकि यहाँ से हमें पैदल ही जाना था कोई साथ किलोमीटर बर्फ में. शुरुवात में बड़ा जोश रहा, लेकिन बर्फ में एक किलोमीटर चलाना प्लेन का ३  किलोमीटर चलने के बराबर होता है, कुछ साँसे फूलने लगी तो कुछ के नाक से खून बहाने लगा , ठण्ड और भी सता रही थी , लेकिन फिर भी हम लोगो ने ठान रखा था, और अपने को कारगिल के जवानो से किसी भी तरह कमतर न आंकते थे. फिर भी कुदरत और आपके सहन हकती से जादा बलवान होती है, अब सभी कोई घर ढूढने  लगे जहाँ से "कुछ " मिल पाता, इस घनघोर बर्फ के जंगल में रम की खोज उसी प्रकार होने लगी जैसे तुलसीदास राम को खोजा करते थे. दूर दूर तक कहीं किसी घर का अता पता न था , तभी दूर कहीं अँधेरे में रोशनी के  किरण जैसे एक झोपड़ी दिखी, सबके जान में जान आई, सबके कदम तेज हो उठे की मानो पारस  पथ्थर अब मिलने वाला है, लेकिन साथ सोच के दिल डूबा जाता था की कहीं सिर्फ पानी  मिले तो ? खैर एसा हुआ नहीं , वह झोपड़ी का लोकल शोपिंग माल था , एकलौता ( अब रेगिस्तान  में मदार में झाड  को ही  पेड़ कहते हैं ) , वहां तीन लीटर रम राम के नाम सहित कब पेट के अंदर गया कुछ पता ही न चला, फिर सबके हाँथ पावन होश में आने शुरू हुए, एक बात तो है नाम के सामान होने का असर तो पड़ता  ही है, राम भी आनंद दिलाते हैं , और  ऐसे मौके पे रम भी.  

चाँद से भी सफ़ेद जमीन 

ये था रम के बाद वाली चहेती स्थिति. 

 जान में जान आने काद फोटोबाजी 


है न पूरा स्विट्जर लैंड ? 

यदि स्वर्ग में भी छंटा पे कमीशन लगा के उनको आधुनिक बना दिया जाए तो  मोर्डन यमराज कुछ ऐसे  ही दिखेंगे.


जमीन ही नहीं आसमान भी खुबसूरत है यहाँ

छज्जो पर जमे हुए ओस / पानी 
 रमबाजी कर हम अपने अंतिम पड़ाव की तरफ रवाना हुए,  पहुच कर  साड़ी थकन दूर हो गयी , इतनी खुबसूरत झील आज तक मैंने कहीं नहीं देखि थी, वह भी इस तापमान में पानीके साथ झील  जहाँ कुछ याक वाले इधर उधर घूम रहे थे. हमने भी एक दो यमराज पोज खिंचवाए.  कोई  घंटे के बाद यहाँ से वापसी हुयी, पैदल. गंतव्य पहुच हम अपने अपने सीटो से चिपक  होटल की और रवाना हुए , यहाँ हमारा होटल था रॉयल प्लाजा जिसके एक तरफ सड़क और दूसरी तरफ घाटियों का सुन्दर दृश्य है था. आज दिन यही समाप्त हुआ . 

क्रमश: ..

Sunday, March 3, 2013

1-IATO -डाईरेक्टर/ सीनियर मैनेजमेंट लेवल फैम ट्रिप टू सिक्किम.-१ (फरवरी २००९ )



सन २००९ में बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा मुझे IATO के एक "फैम टूर"  में जाने का मौका  मिला जिसके होस्ट थे प्रकाश गुप्ता जी जो की हीट फ्लेक्सी कम्पनी के मालिक है, और नार्थ ईस्ट के एक बड़े टूर आपरेटर है. 
वैसे तो  मई साल में दो चार छोटे मोटे कई फैम ट्रिप अटेंड कर लेता था," वन नाईट स्टैंड" टाइप का लेकिन पुरे सेक्टर का वह भी पुरे आठ दिन  ट्रिप यह पहली बार था.  मन  खुश था, उसके दो कारन थे, १ की ये  हाई प्रोफइल फैम ट्रिप था पुरे भारत से  सिर्फ १६ लोग ही थे जिनमे से सभी या तो डारेक्टर थे या बड़े मैनेजर या फिर कंपनियों  के मालिक (हम  इनमे से कुछ भी नहीं थे) २ . सब कुछ फ्री था. बस आने -जाने का फ्लाईट टिकट  खुद  करना था, वो भी मेरी कम्पनी ने करा दिया था. 

Day 1 : 
२३ फरवरी को झोला  झक्कड़ ले के  एयरपोर्ट  पहुचे. एक दिन पहले हमारे उस्ताद ने (बोस) ताकीद की थी  ढंग से सब कुछ देख के आना. खैर पहली बार जहाज में इसी समय बैठा था. बचपन में सोचता था की आसमान में हवाई जहाज का एक्सीडेंट कैसे होता होगा ? अरे सामने  जो कुछ आ जाये तो बाएं से ड्राइवर क्यों नहीं कटा सकता. 

 जहाज रन वे पे दौड़ी, हमें लगा सड़के सड़क ले जायेगा क्या ? तभी वह मृत्यु  लोक छोड़ आकाश में उड़ने लगा. . 

जहाज में बैठते ही विजय माल्या जी सामने  की सीट से प्रकट हुए जिसकी पिठाडी हमारे मुह की तरफ थी, उल जलूल बकने के बाद उनकी बस  एक बात समझ में आई " आप बहुत ही सुरक्षित  यात्रा करेंगे क्योकि की यहाँ की हर एक चीज टेस्टेड है "  और हम  एयर होस्टेज  की तरफ देखने लगे जो कुछ नाश्ता टाइप की चीज ला रही  थी. 

पुरे ३ घंटे से जादा आसमान में उड़ते रहे,  खिड़की  वाली सीट थी,  बाहर देखता रहा की कहीं नारद  वारद न टहल रहे हों, कौन जाने मुलाकात हो जाए. वो नहीं मिले हम भी लैंड कर गए,  यहाँ  का एयर पोर्ट एयर फ़ोर्स वालो से उधार लिया गया है,जिस काम में भारतीय वैसे भी माहिर है.  बाहर  निकल के देखा तो बोर्ड लगा था, "वेलकम टू  फैम " तभी "ट्रेवेलाईट के  मैनेजर रहमान जी  मिल गए, हमने हाथ मिलाया, और जो हाथ मिलाया की पुरे यात्रा तक हम एक ही गाडी में हफ्ते भर घूमते  रहे. वहां से हम सीधे सिलीगुड़ी दीपक जी के फार्म हाउस पे  गए जहाँ सबका परिचय हुआ. फिर वहां से कलिम्पोंग के लिए  रवाना हुए. 

सिलीगुड़ी से कोई दो घंटे बाद हम कलिम्पोंग पहुचे, जहाँ हमारा रुकना एल्गिन के होटल सिल्वर ओक में होना था. यह एक बेहद खुबसूरत होटल है जहाँ से आधा कलिम्पोंग देखा जा सकता है, पहुचाते ही चेरी ब्रांडी  जैसी कोई ड्रिंक दी गयी जो की मीठी थी.  हमें अपने अपने कमरों की चाभी दी गयी, हमें हेमेन्द्र जी के साथ कमरा शयर करना था जो की "पैराडाइज" के  डाईरेक्टर है, थोड़ी देर बात चीत होने के बाद हम सो गए.

आईये सबका परिचय करा दूँ .
left to right : Mr Vijay- Operation head, Heat felxi:| Mr Rahman- Head Travel lite|: Mr Arun : AGM SITA:|  Mr Hemant - Director Paradise| Mr Ajay - Manager - LPTI |Mr Vikram- Trinity| Mr Anurag- AGM Erco |Mr Deepak- Owner Heat Flexi | Again 2nd Mr VInod - Operation head - Heat flexi| Mr Krishna - Manager -Creative  Tour.| ME;) GITC | Mr Prasad Chairman - Travel express Ltd - Chennai.


Me at Silver Oak  Kalimpong 



Day 2 : हमारा  यहाँ एक सूत्री कार्यकर्म था, जगह के साथ साथ होटल देखना, कैल्म्पोंग बहुत ही खुबसूरत हिल स्टेशन है जो दार्जिलिंग के महाभारत रेंज में आता है .  पहले दिन हम ग्रैहम होम और देल्लो हिल देखने गए. ग्रैहम होम एक बहुत ही सुनदर सी जगह थी जहाँ बच्चो को एडाप्ट किया जाता है, वो भी  एक महीने के नवजात शिशु तक को . फिर हम गए उस जगह जहाँ तिब्बत के शरणार्थियो को रखा गया था. उसके बाद एक मोनेस्ट्री विजिट की जिसका नाम मुझे इस समय याद नहीं आ रहा,  इसके बाद कुछ होटलों का निरिक्षण कर गैंगटोक की तरफ रवाना हो गए. 


















 गोम्पा मोनेस्ट्री 







Dr  Graham home 







कैल्म्पोंग से गैंग टोक तक का सफ़र बहुत ही खुबसूरत है , रास्ते में तमाम फ्लोर फ्युना मिलते है, सबसे  ख़ास बात की हर कुछ किलोमीटर  पर पेड़ पर टंगे डस्टबिन होते हैं, आप अपना कूड़ा सड़क पर न फेंक यहाँ दाल सकते है, इस मामले में सिक्किम निश्चित ही अनुशाषित है .


तीस्ता नहीं . सिक्कीम की गंगा 


हमारे पूर्वज 




गैंग टोक पहुचने से पहले रास्ते में पड़ने वाले में फेयर रिसोर्ट पर शाम का हाई टी  लिए .  इस समय यह रिजोर्ट बन रहा था, अब तो बन के दौड़ भी रहा है , निशिचित यह सिक्किम के सबसे खुबसूरत रेसोरतो में से एक है .


मेंफेयर रिसोर्ट 








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